अपील

मित्रो,

आप सभी का सपाक्स संस्था में स्वागत है। हम सभी इस विश्व एवं देश में मानव समाज के महत्वपूर्ण अंग है। आप शिक्षित व संस्कारित है। आपकी धार्मिक एवं सामाजिक अभिरूचियाॅं और दायित्व किसी अन्य से भिन्न हो सकते है, किन्तु वृहद रूप से हम सभी ऐसी व्यवस्था के पोषक होते है जिसमें सभी का विकास एवं कल्याण हो।

देश में जनतांत्रिक शासन व्यवस्था है एवं इस नेतृत्व को हम ही बनाते है तथा यह अपेक्षा करते है कि शासन सभी के हितों की रक्षा करते हुये सभी के उत्थान का कार्य समभाव से करेगा। किन्तु इस व्यवस्था में हम पाते है कि विभिन्न कारणों से कभी-कभी राजनैतिक नेतृत्व उस दिशा से भटक जाता है जो लोकतंत्र की स्थापित मान्यताऐं हैं। ऐसी दशा में छिन्न-भिन्न होती व्यवस्थाओं को दुरूस्त करने की महती जवाबदारी निश्चित रूप से बुद्धिजीवियों की हो जाती है।

स्वतंत्रता के बाद से ही देश में आरक्षण व्यवस्था चल रही है जिसका उद्देश्य पिछड़े एवं शोषित वर्गो का उत्थान कर उन्हें अन्य के समान एक स्तर पर लाना था। आजादी के इतने वर्षो बाद भी यह कार्य पूर्ण नहीं हो सका है। कालान्तर में न सिर्फ इस व्यवस्था की समय सीमा निरंतर बढ़ाई जाती रही बल्कि आरक्षण के प्रावधानों में निरंतर इस वर्ग विशेष के हितार्थ संशोधन किये जाते रहें है। एक ओर जहां न्यायालय अच्छी शासन व्यवस्था के लिये संविधान प्रदत्त अधिकारों की व्याख्यायें कर सीमायें निर्धारित करता रहा वहीं दूसरी ओर निहित स्वार्थों में राजनीतिक दल न्यायालयीन व्याख्याओं को अंॅगूठा दिखाते हुये संविधान संशोधन करते रहे।

हाल ही में 14 वर्षों के संघर्षों के बाद उच्च न्यायालय द्वारा मध्य प्रदेश में प्रभावशील शासकीय सेवा में पदोन्नति नियम 2002 को असंवैधानिक मानते हुये दिनांक 30.4.2016 को अपास्त कर दिया था। उक्त निर्णय को लागू करने के बजाय मध्य प्रदेश शासन द्वारा माननीय सर्वोच्च न्यायालय में तत्काल अपील दायर की गई। दिनांक 12.5.2016 को माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा यथास्थिति बनाये रखने के अंतरिम आदेश शासन की उक्त अपील पर पारित किये थे, किन्तु इसके बावजूद भी शासन के कुछ विभागों द्वारा अपास्त किये गये पदोन्नति नियम 2002 के अनुसार ही पदोन्नति आदेश जारी किये। इस संबंध में संगठन द्वारा विरोध पत्र शासन को लिखा गया, किन्तु स्थिति यथावत रही।

दिनांक 12 जून 2016 को अजाक्स के भोपाल में आयोजित सम्मेलन में माननीय मुख्यमंत्री महोदय उपस्थित हुये तथा यह घोषणा भी की कि ‘‘पदोन्नति में आरक्षण’’ उनके शरीर में साॅस रहने तक कोई ‘‘माई का लाल’’ बंद नहीं कर सकता। माननीय मुख्यमंत्री के उक्त वक्तव्य के आशय और उनकी भावनाओं को हम सभी समझ सकते हैं। उपरोक्त वर्णित स्थितियों में पूरे प्रदेश में अचानक उठे इस बवंडर ने न सिर्फ शासकीय अधिकारियों/कर्मचारियों के बीच समभाव को समाप्त किया है बल्कि इस मुद्दे पर अब एक सामाजिक आंदोलन उठ खड़ा हुआ हैं।

भारतीय संविधान में विभिन्न शासकीय सेवाओं में जाति, धर्म व वर्ग विशेष के आधार पर किसी भी प्रकार की असमानता बरते जाने के कोई प्रावधान नहीं है तथापि वंचित वर्गों के उत्थान के लिये कुछ विशेष प्रावधानों अवश्य है, किन्तु इन प्रावधानों को आधार बनाकर शासकीय सेवाओं में असमानता की स्थितियां उत्पन्न न हो इस संबंध में माननीय न्यायालयों द्वारा विभिन्न प्रकरणों में निरंतर आदेश पारित किये जाते रहे हैं। सामान्य, पिछड़ा एवं अल्पसंख्यक वर्ग के कार्यरत शासकीय कर्मी अनुशासन में रहकर पूर्ण न्यायिक प्रक्रिया के अंतर्गत अपने पक्ष में फैसला हासिल किये थे, किन्तु शासन के वर्तमान रूख से यह स्पष्ट है कि अभी भी अन्याय के विरूद्ध एक लंबी लड़ाई लड़ी जानी होगी।

विगत कुछ समय में सामान्य, पिछड़ा एवं अल्पसंख्यक वर्ग इस संबंध में अत्यंत जागरूक हुआ है। आपसे भी यह अपेक्षा है कि सपाक्स परिवार से जुड़कर आप अपने संवैधानिक अधिकारों के लिये संघर्ष करेंगे।

सहयोग की अपेक्षा के साथ

सपाक्स परिवार